कुछ देर शब और जला अभी तो सिर्फ़ आग़ाज़ है चाँद कुछ और सुलगा नींद अभी नाराज़ है कहाँ मैं मयसर अभी कहाँ कोई सुरूर है कुछ खामोशी है मगर कुछ ...
Wednesday, April 2, 2014
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