Tuesday, April 10, 2012

This one too made it from the drafts somehow…been a few years since I wrote it though.


सूखे होंठ, रूखे बाल
गीली रातें, मूक सवाल
भागती सांसें, उखड़ती धड़कन
रूकती नब्ज़, बुझता जीवन
गर्म दोपहरी, समय की अनबन
पिघलती शामें, ढलता ये मन
अंधी सडकें, मंजिल,  राहें
उठती लहरें, बिखरी चाहें
उधड़ते-बुनते चूर ये सपने
खिंचते ताने ये जाने-अपने
गहरी बातें, खून सुनहरी
गुज़रते काफिले, दुनिया ठहरी
कंटीले जंगल, सूने बाग़
टूटे कलश, राख और आग
जागती पलकें, छिलते पाँव
कहाँ की बस्ती, कहाँ के गाँव

झीनी धूप और बोझिल दिन
ये ज़िन्दगी - अब तेरे बिन
 Feather
10 Apr 2012

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