Friday, February 10, 2012

कुछ था अधूरा सा
शाम के कोनों पर
सिमटता छुपता 
हाथ से छूने पर जो
पिघलता बहता था
कभी आँखों से छन कर
सिरहाने सूखता और
सुबह होने तक कहीं
हवा में जा घुलता था

कुछ था धुंए सा
सांस के सिरे से
बंधता उखड़ता
दिन और रात जो
सीने में जलता था
कभी आह बन उठता
और बिना थमे, रुके
माथे से टपकता
लहू बन जाता था

कुछ था गहरा सा
सपनों में पिरोया
बुनता उधड़ता
खुली आँखों में जो
बिखरा रहता था
कभी धूप में चमकता
और खुशबू सा उड़ते
होठों पर यकायक
मुस्कान बन जाता था 

कुछ था अपना सा
सुबह की ओस में
पलता बढ़ता
मौसमी बारिश में जो
बाहर खड़ा भीगता था
नज़र उठा देखता
तो लौट जाने से पहले
तुम्हारे घर के बाहर
बूँद-बूँद बिखर जाता था

कुछ है पराया सा
उम्मीद की तहों में
जागता सोता
हसरतों में मेरी जो
घर बनाए रहता है
कभी कहीं मिलता है
तो वक़्त सा दौड़ते
अनदेखा कर मुझे
यूँ ही गुज़र जाता है

Feather
10 Feb 2012

3 comments :

Roopa said...

very nice.. loved every word... keep writing...

Gaurav Kant Goel said...

Very nice!!! :)

Himanshu Tandon said...

@Roopa - Thanks. You have always been very encouraging.

@Gaurav - Good to see you around on the blog after long.

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