आरज़ू और इल्तिज़ा का बस इतना फ़साना है
एक सांस का आना, एक सांस का छूट जाना है
तुम्हें गुरूर हो अपनी संगदिली का बेशक़
हमें ना-गवारा एक आह का निकल जाना है
वो बे-परवाह सही हमारी तिश्नगी से
अपना वक़्त गोया, यूँ ही गुज़र जाना है
उनके चले जाने से मैं कब मायूस था
मेरे साथ यूँ भी कहाँ, किसने जाना है ?
हमें आदत हो चली है इस ग़म-ए-हयात की
तुम्हें याद करते रहना तो बस इक बहाना है
बेहतर यह है कि तहज़ीब-ए-इखलास की खातिर
भूल जाओ की हम मिले थे, कहाँ अपना ठिकाना है
गुज़रता रहा ता-उम्र उन्हीं गलियों से बार बार
भूल जाना तुम्हें भी तो ख़ुद-ब-ख़ुद याद आना है
चलो उठते हैं, साथ ये महफ़िल भी लिए जाते हैं
समझो तो हमदम अपना, देखो तो खाली पैमाना है
आईना हँसता क्यों है, देख कर चेहरा मेरा
अभी तो एक रात हमें और लड़खड़ाना है
स्याह शब मानो, खुद अपनी नियामत है
तुम सो जाओ, हमें तो चाँद तक जाना है
ठहर जाते, कुछ और देर रहगुज़र अभी
एक दिन तो सबने ही अपने घर जाना है
वक़्त-ए-रुख़सत आखिरी सलाम लेते जाओ
जब तक है जान, तभी तक तो ज़माना है
Thursday, September 20, 2018
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